Shravak Pratikraman in Hindi श्रावक प्रतिक्रमण शुद्ध हिंदी में

Shravak Pratikraman in Hindi श्रावक प्रतिक्रमण शुद्ध हिंदी में

Shravak Pratikraman in Hindi श्रावक प्रतिक्रमण शुद्ध हिंदी में

श्रावक प्रतिक्रमण (हिंदी) श्रमण सुतसागर कृत

हे परम परमेश्वर! देवाधिदेव शासन नायक तीर्थंकर जिनेन्द्र! मैं भवों-भवों में संचित पापों के क्षय के लिए, आत्म शुद्धि, आत्म शोधन एवं आत्मशांति के लिए, आत्म-जागृति पूर्वक प्रतिक्रमण और आलोचना करना चाहता हूँ।
हे भगवान! मैंने अज्ञानतापूर्वक, मोह के वशीभूत होकर भयंकर पाप किए हैं। मैं पश्चाताप करता हुआ, अपने दोषों की आलोचना करने हेतु कायोत्सर्ग करता हूँ।
(नौ बार णमोकार मंत्र का जाप करें)
दोनों हाथ जोड़कर, आत्मजागृति पूर्वक, आँखें बंद कर मंद स्वर में ओंकार की ध्वनि करें …
ओम् ………ओम् ………ओम् ………

पंच परमेष्ठी वंदना

हे ज्ञानधननाथ अरिहंती परमात्मा सिद्ध परमेश्वर! अनन्त चतुष्टय रत्नत्रय से समृद्ध अरिहंत जिनेश्वर! पंचाचार परायण, द्वादश तप, दस धर्मधर हे आचार्य भगवान! द्वादशांग के पाठी, हे उपाध्याय पाठक-पाठकी! पंच महाव्रतधारी, आरंभ-परिग्रह त्यागी, मोक्षमार्गी, निर्ग्रन्थ वीतरागी, धरती के देवतुल्य संतों, हे मुनि! मैं आपको भक्ति-भाव पूर्वक कोटि-कोटि वंदन नमन करता हूँ।

मैं भगवान्-आत्मा

हे भगवान! मैं त्रैकालिक चेतन द्रव्य हूँ। मैं सर्वशक्तियों का भंडार हूँ। मैं अनन्त स्वभावी आत्मा हूँ। मैं अनन्त गुण का पुंज, परम-शांति का भोक्ता, शक्ति रूप सिद्ध समान हूँ। मैं शाश्वत सुख स्वरूप आत्म द्रव्य हूँ। मैं सरल, अरूपी, अमूर्तिक, शुद्ध-विशुद्ध, ज्ञान स्वरूपी, निर्मल परमात्म शक्ति सम्पन्न भावों भगवान हूँ। मैं परमानंद का भोक्ता, अखण्ड, उपयोगमयी, स्वसंवेदनमय, स्वतंत्र, सनातन हूँ। मैं शुद्ध-बुद्ध भगवंत सत्ता से सम्पन्न आत्म-द्रव्य हूँ, परंतु अनादि से निज को भूलकर मोह के वश, राग-द्वेष से मलिन होकर, भयंकर संसार-सागर में गोते लगा रहा हूँ।

Shravak Pratikraman in Hindi श्रावक प्रतिक्रमण शुद्ध हिंदी में
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मेरी भूल

हे दया के सागर! गुरु भगवान! मैंने परमधर्म से शून्य होकर, पतित जीवन जिया है। मैं पाप से पतित हूँ। मैं क्रोधी-मानी-मायावी-लोभी हूँ। मैं राग-द्वेष से मलिन, दुरात्मा हूँ। कषाय से कलंकित हूँ। संसार के दुःखों से अत्यन्त दुःखी हूँ। मैंने कषाय के वशीभूत होकर अहो-रात्र दुःखमय कर्म किए हैं। मैं दोषों की आलोचना करते हुए प्रतिक्रमण करता हूँ। मैं प्रयत्नपूर्वक पापों को छोड़ता हूँ। मेरे समस्त अपराध क्षमा हों, सारे दोष मिथ्या हों। मैं परम-पवित्र जिनमार्ग का अनुसरण करता हूँ। मेरे सम्पूर्ण पापों का क्षय हो, मेरे परिणाम पवित्र हों।
तस्स मिच्छा मे दुक्कडं, तस्स मिच्छा मे दुक्कडं, तस्स मिच्छा मे दुक्कडं …

पाँच पाप एवं सप्त व्यसनों की आलोचना

हे प्रभु! मैं अज्ञानी हूँ, पापी हूँ। मैंने अनमोल जीवन को अनैतिक व्यसनों एवं पाप-प्रवृत्ति में व्यर्थ गंवा दिया। क्षण-क्षण में आत्मचिंतन हो रही है। हे भगवान! मैंने हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील और परिग्रह संचय रूप पंच-पापों में फँसकर क्रोध, मान, माया और लोभ रूप चार कषायों के वश में होकर, जुआ खेला हो, मांस सेवन किया हो, मदिरा पान किया हो, शिकार किया हो, वेश्या रमण किया हो, पर स्त्री पर खोटी दृष्टि डाली हो, कृत-कारित-अनुमोदना से, मन-वचन-काय से सप्त-व्यसनों में चित्त लगाया हो, तो मैं पश्चाताप पूर्वक दोषों की आलोचना करता हुआ प्रतिक्रमण करता हूँ। मेरे पापों का क्षय हो, परिणाम विशुद्ध हों, मैं सरलपूर्वक योग्य मार्ग पर चलूँ कृ यही मेरी भावना है।
तस्स मिच्छा मे दुक्कडं, तस्स मिच्छा मे दुक्कडं, तस्स मिच्छा मे दुक्कडं …

आत्मल्याणी क्षमा

हे दया के सागर! मैं पश्चाताप करता हुआ, पापों से विरक्त होता हूँ। मैं आत्म कल्याण हेतु सभी जीवों से क्षमा माँगता हूँ। क्षमा ही सर्वश्रेष्ठ है, क्षमा से ही शांति संभव है। क्षमा आत्मोत्थान का द्वार है। क्षमा ही परम-अमृत है। क्षमा वीरों का भूषण है। क्षमा भव्यों का श्रृंगार है। क्षमा आत्मशांति का परम स्थान है। क्षमा ही धर्म है। क्षमा के समान हितकारी अन्य कोई धर्म नहीं है। क्षमा से ही आत्मकल्याण संभव है। क्षमा से ही धर्म प्रारंभ होता है। क्षमा धर्म महान् है। क्षमा से ही मोक्षमार्ग प्रारंभ होता है, इसीलिए मैं सभी जीवों से क्षमा चाहता हूँ, सभी जीवों को क्षमा करता हूँ। सभी जीव मुझे क्षमा करें, सभी जीवों में मेरा मैत्री भाव हो। मैं बैर-भाव को छोड़कर, क्रोध भाव को त्याग कर, क्षमा भाव को धारण करता हूँ। मैं दया-करुणा का पात्र हूँ। मैं क्षमा प्रार्थी हूँ। हे भगवन्! हे गुरुदेव! मुझे क्षमा करो, क्षमा करो, क्षमा करो।
तस्स मिच्छा मे दुक्कडं, तस्स मिच्छा मे दुक्कडं, तस्स मिच्छा मे दुक्कडं …

पंच अणुव्रत में हुए दोषों का प्रतिक्रमण
अहिंसाणुव्रत सम्बन्धी आलोचना

हे दया के सागर! परम-परमेश्वर! मैंने प्रमाद पूर्वक, अज्ञानता के वशीभूत, कषाय के आवेग में जीवों को पीड़ा पहुँचाई हो, एकेन्द्रिय, द्वीन्द्रिय, तीन इन्द्रिय, चार इन्द्रिय, पंचेन्द्रिय (संज्ञी-असंज्ञी) किसी भी जीव का छेदन, बंधन, पीड़न-ताड़न किया हो, कराया हो या अनुमोदना की हो तो क्षमा चाहता हूँ। उचित विधि से छाने बिना ही पानी का प्रयोग किया हो, प्रमाद पूर्वक अनैतिक कार्य किया हो। मेरे द्वारा उठने-बैठने, चलने-फिरने में, खाने-पीने में, खाँसने-छींकने में, असावधानी पूर्वक जंभाई लेने में, हलन-चलन में मेरे द्वारा किसी भी जीव को मानसिक शारीरिक कष्ट पहुँचा हो, संक्लेशितता हुई हो, परिणाम बिगड़े हों, जीवों को मेरे द्वारा कष्ट पहुँचा हो, मैंने अभक्ष्य भोजन किया हो, हिंसक सामग्री का उपयोग किया हो, मन-वचन-काय, कृत-कारित-अनुमोदना से, ज्ञाताज्ञात रूप से श्अहिंसाणुव्रतश् में दोष लगाया हो, तो मैं क्षमा प्रार्थी हूँ। मैं क्षमा भाव को धारण करता हूँ। मेरे सम्पूर्ण पापों का क्षय हो, मेरा जीवन मंगलमय हो, अहिंसा ही शरण है, अहिंसा ही परम-धर्म है।
तस्स मिच्छा मे दुक्कडं, तस्स मिच्छा मे दुक्कडं, तस्स मिच्छा मे दुक्कडं …

सत्याणुव्रत सम्बन्धी आलोचना

हे तारण-तरण अरिहंत जिनेश्वर! मैंने अहंकार-ममकार के वश होकर, अज्ञान, प्रमाद, कषाय के कारण किसी जीव को तिरस्कारपूर्ण, अप्रिय, कठोर, पीड़ा-दायक, दुर्वचन कहे हों, लोभ एवं भय के वश असत्य बोला हो, हँसी मजाक किया हो, व्यर्थ बकवाद किया हो, कुटिल भाषा बोली हो, किसी की चुगली-निंदा की हो, मिथ्या वार्ता की हो, किसी की गुप्त बात को प्रकट किया हो, झूठा लेख लिखा हो, राजकथा, चोर कथा, स्त्रीकथा अथवा भोजन कथा की हो, मन-वचन-काय, कृत-कारित-अनुमोदना से सत्याणुव्रत में ज्ञाताज्ञात रूप से जो भी दोष लगाया हो, तो मैं क्षमा चाहता हूँ। मैं अपने दोषों की आलोचना करता हूँ। मेरे सम्पूर्ण पापों का क्षय हो। मैं हमेशा हित-मित प्रिय सत्यवचन बोलूँ।
तस्स मिच्छा मे दुक्कडं, तस्स मिच्छा मे दुक्कडं, तस्स मिच्छा मे दुक्कडं …

अचौर्याणुव्रत सम्बन्धी आलोचना

हे ईश्वर! जगत् परमेश्वर! मैंने लोभादि के वश पर-वस्तु को ग्रहण किया हो, किसी की रखी हुई, भूली हुई, पड़ी हुई वस्तु का हरण किया हो, शासन के विरुद्ध कार्य किया हो, अनैतिक उपाय से धन अर्जन किया हो, अन्य किसी भी प्रकार से श्अचैर्याणुव्रतश् में दोष लगाया हो, चोरी की हो, तो मैं सभी दोषों की आलोचना करता हूँ। मेरे सम्पूर्ण पापों का क्षय हो।
तस्स मिच्छा मे दुक्कडं, तस्स मिच्छा मे दुक्कडं, तस्स मिच्छा मे दुक्कडं …

ब्रह्मचर्य अणुव्रत सम्बन्धी आलोचना

हे ब्रह्मस्वरूप परम परमेश्वर! व्रतों का सम्राट् ब्रह्मचर्य व्रत है। विशुद्धि पूर्वक ब्रह्मचर्य ही सिद्धि का साधन है। यश देने वाला कोई है तो वह ब्रह्मचर्य व्रत है। मैंने किसी भी प्रकार से ग्रहण किए व्रतों में दोष लगाया हो, अश्लील चित्र देखे हों, कामुक साहित्य पढ़ा हो, कुटिलतापूर्ण द्वि-अर्थी वार्ता की हो, कामना-वासना से युक्त होकर किसी का स्पर्श किया हो, तामसिक भोजन किया हो, वासना के वश पशु-वृत्ति की हो, ताककर, सूँघकर, सुनकर, स्पर्श करके अन्य किसी भी प्रकार से काम सेवन किया हो, शरीर का श्रृंगार किया हो, अभद्र हँसी-मजाक किया हो, रति-परिणाम किए हों, ज्ञाताज्ञात किसी भी प्रकार से ब्रह्मचर्य अणुव्रत में दोष लगाया हो, तो पश्चाताप करता हुआ आलोचना, प्रतिक्रमण करता हूँ। मेरे सम्पूर्ण दोषों का क्षय हो, परिणाम विशुद्ध हों, बोधि की प्राप्ति हो।
तस्स मिच्छा मे दुक्कडं, तस्स मिच्छा मे दुक्कडं, तस्स मिच्छा मे दुक्कडं …

परिग्रह परिमाण अणुव्रत सम्बन्धी आलोचना

हे निर्ग्रन्थ, निर्मोह, निसंग, निर्विकल्प वीतरागी मुनीश्वर! मूर्च्छा ही परिग्रह है। परिग्रह ही संसार को बढ़ाने वाला है। जैसे मकड़ी जाल में, मक्खी कफ में, तिर्यंच प्राणी कीचड़ दलदल में फँसकर प्राण गवाँते हैं, वैसे ही परिग्रह में फँसा प्राणी तड़फ-तड़फ कर मरण को प्राप्त होता है। अनर्थों की जड़, पाप का मूल यदि कोई है तो वह परिग्रह है। मैंने कषाय, अज्ञान और अनादि के कुसंस्कारों के वश होकर परिग्रह संचय किया हो, पर-द्रव्य में राग-मोह किया हो, परिग्रह परिमाण अणुव्रत में मन-वचन-काय, कृत-कारित-अनुमोदना से दोष लगाया हो, तो मेरा सम्पूर्ण पाप क्षय को प्राप्त हो, मैं अपने हृदय में संतोष और समता धारण करूँ।
तस्स मिच्छा मे दुक्कडं, तस्स मिच्छा मे दुक्कडं, तस्स मिच्छा मे दुक्कडं …

अष्ट मूल गुणों में हुए दोषों की आलोचना एवं प्रतिक्रमण

हे परमोपकारी परमेश्वर! हे करुणा के सागर गुरुवर! मुझ पर दया करो, करुणा करो, मेरा शांति-पथ का प्रदर्शन करो। मुझे सन्मार्ग प्रदान करो, मेरी पापों से रक्षा करो। मैंने कषाय, अज्ञान एवं आसक्ति के वश अभक्ष्य, अनिष्ट बड़, पीपल, ऊमर, कठूमर, पाकर, अंजीर, आलू-प्याज-लहसुन मद्य, मांस, मधु (शहद) आदि हिंसक द्रव्यों का सेवन किया हो, रात्रि भोजन किया हो, असेव्य सामग्रियों का सेवन किया हो, मन-वचन-काय, कृत-कारित-अनुमोदना से अष्टमूलगुणों में दोष लगाया हो, तो मैं सभी पापों की आलोचना, पश्चाताप करता हुआ, प्रतिक्रमण करता हूँ। मेरे पापों का क्षय हो, मुझे रत्नत्रय की प्राप्ति हो, समाधिपूर्वक मरण हो, सुगति में गमन हो, सुख शांति की प्राप्ति हो।
तस्स मिच्छा मे दुक्कडं, तस्स मिच्छा मे दुक्कडं, तस्स मिच्छा मे दुक्कडं …

छह आवश्यकों में हुए दोषों की आलोचना

हे गुणेश्वर नरोत्तम निर्ग्रन्थ शिव-शंकर! मैंने प्रमाद, अज्ञान या कषाय के वश होकर अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय एवं साधु परमेष्ठी, जिनधर्म, जिनागम, जिनबिम्ब की असादना की हो, जिन पूजा, गुरु सेवा, स्वाध्याय, संयम पालन में दोष लगाया हो, शक्ति अनुसार समय पर, सत्कार पूर्वक दान न किया हो, किसी भी प्रकार से षट्-आवश्यक में दोष लगाया हो, तो मेरे पापों का क्षय हो। मैं आलोचना पूर्वक प्रतिक्रमण करता हूँ।
तस्स मिच्छा मे दुक्कडं, तस्स मिच्छा मे दुक्कडं, तस्स मिच्छा मे दुक्कडं …

श्रावक की तिरेपन क्रियाओं में हुए दोषों की आलोचना

हे विशुद्धि के सागर, विद्यादाता तारण-तरण श्री गुरुदेव! मेरी रक्षा करो, मैं आत्मशांति के लिए आपकी शरण में आया हूँ। संसार असार है, भोग निस्सार हैं, संबंध अशाश्वत हैं, यौवन क्षणभंगुर है, समय थोड़ा है और विघ्न-बाधाएँ बहुत हैं। एकमात्र जिन धर्म ही शरण है, मंगल और उत्तम है। संयम-तप ही सिद्धि का सच्चा साधन है, जिनागम ही अमृत है, गुरु सान्निध्य ही कल्पवृक्ष है, गुरुवाणी ही कल्याणी है।
मैंने अष्टमूलगुण, बारह व्रत, बारह तप, समता, ग्यारह प्रतिमा, चार दान, जलगालन, रात्रि भोजन त्याग, सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र रूप श्रावक की तिरेपन क्रियाओं में दोष लगाए हों, उन सभी की मैं आलोचना करता हुआ प्रतिक्रमण करता हूँ।
तस्स मिच्छा मे दुक्कडं, तस्स मिच्छा मे दुक्कडं, तस्स मिच्छा मे दुक्कडं …

सर्व आलोचना

हे प्रभु! मैंने जाति-कुलादि आठ मद किए हों, लोकादि मूढ़तायें की हों, अनायतन की वृद्धि की हो, शंकादि दोष किए हों, शिकारादि व्यसनों में प्रवृत्ति की हो, निर्माल्य सेवन किया हो, सप्त भयों से भयभीत हुआ हूँ, व्रतों में अतिचार किया हो, साधर्मी से कलह किया हो, पूज्यों का तिरस्कार किया हो, पर दोष दिग्दर्शन किया हो, कष्टकारी वचन बोले हों, बिसंवाद किया हो, किसी भी प्रकार से जीवों को दुःख पहुँचाया हो, तो मैं अपनी आलोचना करता हूँ, प्रतिक्रमण करता हूँ।

नौ बार णमोकार मंत्र का जाप करें

“णमोकार मंत्र”

णमो अरिहंताणं।
णमो सिद्धाणं।
णमो आयरियाणं।
णमो उवज्झायाणं।
णमो लोए सव्वसाहूणं।

चत्तारि मंगलं, अरिहंता मंगलं, सिद्धा मंगलं, साहू मंगलं, केवलिपण्णत्तो धम्मो मंगलं।
चत्तारि लोगुत्तमा, अरिहंता लोगुत्तमा, सिद्धा लोगुत्तमा, साहू लोगुत्तमा, केवलिपण्णत्तो धम्मो लोगुत्तमो।
चत्तारि सरणं पव्वज्जामि, अरिहंते सरणं पव्वज्जामि, सिद्धे सरणं पव्वज्जामि, साहू सरणं पव्वज्जामि,
केवलिपण्णत्तं धम्मं सरणं पव्वज्जामि।

प्रातः कालीन वन्दना

  • १. सिद्ध शिला पर विराजमान अनंतानंत सिद्ध परमेष्ठी भगवन्तों को मेरा बारम्बार नमस्कार है।
  • २. वृषभादिक महावीर पर्यन्त अंगुलियों के २४ पोरों में विराजमान २४ तीर्थंकरों को मेरा नमस्कार है।
  • ३. सीमंधर आदि विद्यमान २० तीर्थंकरों को मेरा बारम्बार नमस्कार है।
  • ४. सिद्ध क्षेत्र सम्मेद शिखर जी को मेरा बारम्बार नमस्कार है।
  • ५. चारों दिशाओं और विदिशाओं में विराजमान सभी अरिहंत जी, सिद्ध जी, आचार्य जी, उपाध्याय जी, सर्वसाधु जी, जिनधर्म, जिनागम व कृत्रिम-अकृत्रिम चैत्य-चैत्यालय हैं, उनको मेरा मन-वचन-काय से बारम्बार नमस्कार है।
  • ६. पाँच भरत, पाँच ऐरावत, दश क्षेत्र सम्बन्धी तीस चैबीसी के सात सौ बीस जिनवरों को मेरा बारम्बार नमस्कार है।
  • ७. जितने भी अतिशय क्षेत्र, सिद्ध क्षेत्र, जिनवाणी, शास्त्र, मुनिराज, माताजी, ऐलक, क्षुल्लक, क्षुल्लिकाजी हैं, उन सबके चरणों में मेरा मन-वचन-काय से बारम्बार नमस्कार है।
  • ८. हे भगवन! तीन लोक सम्बन्धी ८ करोड़ ५६ लाख ९७ हजार ४८१ अकृत्रिम जिन चैत्यालयों को मैं नमस्कार करता/करती हूँ, उन चैत्यालयों में स्थित ९२५ करोड़ ५३ लाख २७ हजार ९४८ जिन प्रतिमाओं की वन्दना करता/करती हूँ।
  • ९. हे भगवन! मैं यह भावना भाता/भाती हूँ कि मेरा आज का दिन खूब मंगलमय हो, अगर मेरी मृत्यु भी आती है तो भी मैं तनिक भी नहीं घबराऊँ, मेरा अत्यंत सुखद समाधिपूर्वक मरण हो, जगत जितने भी जीव हैं वे सभी सुखी रहें, उन्हें किसी भी प्रकार का कष्ट, दुःख, दरिद्र, रोग न सताए और सभी जीव मुझको क्षमा करें और सभी जीवों पर मेरा क्षमा भाव रहे।
  • १०. मेरे समस्त कर्मों का क्षय हो, समस्त दुःख दूर हों, रत्नत्रय धर्म की प्राप्ति हो, जब तक मैं मोक्ष पद को न प्राप्त कर लूँ, तब तक आपके चरण कमल मेरे हृदय में विराजमान रहें और मेरा हृदय आपके चरणों में रहे।
  • ११. मैं सम्यक्त्व धारण करूँ, रत्नत्रय पालन करूँ, समाधिपूर्वक मरण करूँ, यही मेरी भावना है।
  • १२. जिस दिशा में रहूँ, आऊँ, जाऊँ उस दिशा की मुझे छूट है, बाकी सब दिशाओं में आवागमन का मुझे त्याग रहेगा, अगर कोई गलती हो तो मिथ्या होवे।
  • १३. जिस दिशा में रहूँ, उस दिशा में कोई पाप हो, उस पाप का मैं भागीदार न बन सकूँ, अगर किसी प्रकार की अड़चनें, बीमारी आ जाए, दर्शन न कर सकूँ, पूजा न कर सकूँ, उसके लिए मैं क्षमा चाहूँगा/चाहूँगी, मंदिर जी में रहूँ, पूजा बोलूँ तब तक मेरे शरीर में जो भी परिग्रह है, जो भी मंदिर जी में मेरे प्रयोग में आएगा, उन सबको छोड़कर बाकी अन्य समस्त परिग्रह का मुझे त्याग रहेगा, अगर इसी बीच मेरी मृत्यु हो जाए तो मेरे शरीर का जो भी परिग्रह है उसका मुझे त्याग रहेगा।

“अच्छेमि, पुज्जेमि, वंदामि, णमस्सामि, दुक्खक्खओ, कम्मक्खओ”
“बोहि लाभो, सुगईगमणं, समाहि मरणं, जिणगुण संपत्ति होऊ मज्झं”
।। पंच परमेष्ठी भगवान की जय ।।

36 बार णमोकार मंत्र बोलकर फिर आपस में दोनों हथेलियों को रगड़कर पूरे शरीर को स्पर्श करें !!

Shravak Pratikraman in Hindi श्रावक प्रतिक्रमण शुद्ध हिंदी में

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